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او از مادرش آموخت كه چگونه بايد در مقابل دشمنان ايستادگي كرد «... صبرا علي قضائك، لااله سواك يا غياث المستغيثين» «خداوندا! در برابر قضا و قدر تو شكيبايم. جز تو معبودي نيست اي فريادرس دادخواهان».
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| وام گـذار لـــب تـــــو
راســـتـــــی
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| گفتی و چون شعله به پا خاستی
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| بـانـگ رسـای تـو ستــم سـوز شد
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| کـشتــه مـظـلـوم تـو، پـیـروز شد
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| خواست که غم دست تو بندد ولی
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| غـم کــه بـُـود در بــر دُخـت
علی؟
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| قــامــت تــو قـامت غم را شکست
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| دُخـت علــی را نتوان دست بست
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| ای دل دریـــــا، دل دریــــای
تـــــــو
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| عـرش خـــدا مـــنــزل و مـأوای
تو
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| جـسم تــو از عـشق مـگر ساختند
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| کـایــن هـمـه جـان در ره تـو
باختند
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| آنـچـه تــو کــردی بـه صــف
کـربـــلا
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| کـــردهی مــخـلــوق بــود یــا
خدا؟
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| آن هـمـه غـم، آن هـمـه استـادگی
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| آن هــمـــه سُـتـْــواری و
آزادگــی
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| آن همه خون دیدن و چون گُل شدن
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| دشت خـــزان دیـدن و بـلـبل شدن |
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علی موسوی گرمارودی |